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Research Article • Peer-Reviewed

वैदिक ग्रंथों में वर्णित खगोलीय घटनाओं एवं ग्रहों की स्थिति का आधुनिक खगोलशास्त्र के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन

अनिल शर्मा

Volume 1 (2026) Issue 1 Published: 09 Jan 2026

Abstract

वैदिक खगोलशास्त्र और आधुनिक खगोलशास्त्र दोनों का मूल उद्देश्य आकाशीय पिंडों एवं खगोलीय घटनाओं का अध्ययन करना है, किंतु दोनों की दृष्टि, पद्धति एवं आधार भिन्न हैं। जहाँ वैदिक खगोलशास्त्र धार्मिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से संबद्ध था, वहीं आधुनिक खगोलशास्त्र वैज्ञानिक, गणनात्मक तथा प्रायोगिक दृष्टिकोण पर आधारित है। वैदिक काल में ग्रहों एवं नक्षत्रों की गति, काल-गणना तथा आकाशीय घटनाओं का निर्धारण ज्योतिषीय पद्धतियों के माध्यम से किया जाता था, जबकि आधुनिक खगोलशास्त्र में न्यूटन के सिद्धांतों, कक्षीय गणनाओं तथा खगोल-भौतिकी के उन्नत उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

वैदिक खगोलशास्त्र प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसमें आकाश, ग्रह, नक्षत्र तथा उनके मार्गों का अध्ययन किया गया है। यह न केवल आकाशीय घटनाओं का वैज्ञानिक विवेचन करता है, बल्कि वेदों के मंत्रों, शास्त्रों एवं धार्मिक कर्मकांडों में इन घटनाओं के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को भी स्पष्ट करता है। इसके सिद्धांत मुख्यतः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में निहित हैं, जहाँ ग्रहों की गति, तारों की स्थिति, खगोलीय घटनाओं तथा उनके मानव जीवन पर प्रभाव का उल्लेख मिलता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में वैदिक एवं आधुनिक खगोलशास्त्र के सिद्धांतों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उनकी वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।

Keywords

वैदिक खगोलशास्त्र आधुनिक खगोलशास्त्र ग्रह एवं नक्षत्र खगोलीय घटनाएँ वैदिक ग्रंथ ज्योतिषीय गणना वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परंपरा

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